झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने Jharkhand Mining Bill Reconsider की मांग करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 2026 के Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill पर दोबारा विचार करने की अपील की है। सोरेन का कहना है कि खनिजों से मिलने वाला राजस्व झारखंड की अर्थव्यवस्था और कल्याणकारी योजनाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
13 अगस्त को पीएम मोदी को लिखे पत्र में सोरेन ने कहा कि Mineral Bearing Land Cess से राज्य को हर साल करीब ₹7,110 करोड़ मिलने की उम्मीद थी। उन्होंने चेतावनी दी कि खनन से जुड़े राजस्व पर बड़ी पाबंदी लगने से राज्य की विकास, कल्याण और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की वित्तीय क्षमता प्रभावित हो सकती है।
Jharkhand Mining Bill Reconsider: आखिर हेमंत सोरेन क्यों कर रहे विरोध?
हेमंत सोरेन ने इस बिल को झारखंड के हितों के खिलाफ बताते हुए कहा कि राज्य की खनिज संपदा से मिलने वाला राजस्व उसकी वित्तीय व्यवस्था का अहम हिस्सा है।
झारखंड के State Economic Survey 2025-26 के हवाले से सोरेन ने कहा कि वित्त वर्ष 2024-25 में खनन से मिलने वाला राजस्व राज्य के अपने non-tax revenue का 84.9 फीसदी था। ऐसे में Mining Bill 2026 के प्रावधानों से राज्य की वित्तीय गुंजाइश प्रभावित होने की आशंका उन्होंने जताई है।
सोरेन के मुताबिक, खनिजों से मिलने वाले राजस्व का इस्तेमाल सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण बुनियादी ढांचे, आजीविका, पुनर्वास और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में किया जाता है।

Mining Bill 2026 में ऐसा क्या है, जिस पर राज्यों को आपत्ति है?
संसद ने 13 अगस्त को Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 को मंजूरी दी। बिल का एक प्रमुख प्रावधान राज्यों की ओर से mineral rights और mineral-bearing land पर नए टैक्स, cess या अन्य levies लगाने की शक्ति को सीमित करता है, जब तक कि वे केंद्र द्वारा तय शर्तों के तहत न हों।
केंद्र सरकार का तर्क है कि अलग–अलग राज्यों में खनन पर अलग–अलग और अधिक वित्तीय बोझ से mining sector में लागत और अनिश्चितता बढ़ सकती है। प्रस्तावित बदलाव का उद्देश्य खनिज क्षेत्र के लिए अधिक समान tax framework तैयार करना बताया गया है।
यही प्रावधान Centre-State Mining Dispute की बहस का मुख्य कारण बन रहा है। झारखंड जैसे खनिज संपन्न राज्य इसे अपनी वित्तीय स्वायत्तता और संसाधनों पर अधिकार से जोड़कर देख रहे हैं।

झारखंड के लिए ₹7,110 करोड़ का सवाल क्यों बड़ा है?
सोरेन ने कहा कि Mineral Bearing Land Cess से करीब ₹7,110 करोड़ सालाना राजस्व मिलने की उम्मीद थी। उनका तर्क है कि खनन से होने वाली कमाई केवल सरकारी खजाने का आंकड़ा नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल उन इलाकों में विकास और सामाजिक सुरक्षा के लिए किया जाता है जहां खनन का सीधा प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने यह भी कहा कि दशकों से बड़े पैमाने पर mining के कारण विस्थापन, जमीन का नुकसान, प्रदूषण, पर्यावरणीय क्षति और स्थानीय बुनियादी ढांचे पर दबाव जैसी समस्याएं सामने आई हैं।
ऐसे में मुख्यमंत्री का कहना है कि राज्य और स्थानीय समुदाय खनन की सामाजिक और पर्यावरणीय लागत भी उठाते हैं, इसलिए उनसे जुड़े राजस्व स्रोतों को सीमित करने से पहले इन पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है।
खनन राजस्व घटा तो योजनाओं पर क्या असर पड़ेगा?
सोरेन ने चेतावनी दी कि अगर राज्य को खनिजों से मिलने वाले राजस्व में बड़ी कमी आती है और उसकी जगह कोई स्थायी वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो विकास और welfare programmes पर दबाव बढ़ सकता है।
उन्होंने खास तौर पर सड़कों, स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण infrastructure, drinking water और mining-affected क्षेत्रों में rehabilitation जैसे कामों का जिक्र किया।
मुख्यमंत्री ने महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना का भी उल्लेख करते हुए कहा कि वित्तीय संसाधनों में अचानक कमी आने से ऐसी योजनाओं को जारी रखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
क्या सिर्फ झारखंड ही बिल का विरोध कर रहा है?
झारखंड के अलावा अन्य खनिज संपन्न राज्यों की ओर से भी बिल को लेकर चिंता सामने आई है। संसद से बिल पारित होने के बाद राज्यों की वित्तीय शक्तियों और mining revenue को लेकर बहस तेज हुई है।
यह विवाद केवल Mining Policy India 2026 तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में बड़ा सवाल यह है कि प्राकृतिक संसाधनों से मिलने वाले राजस्व और उनसे जुड़े अधिकारों के बीच केंद्र और राज्यों का संतुलन किस तरह तय किया जाए।
निष्कर्ष
Jharkhand Mining Bill Reconsider की मांग के जरिए हेमंत सोरेन ने केंद्र के सामने राज्य की वित्तीय चिंता रखी है। उनका कहना है कि खनिज संपदा से मिलने वाला राजस्व झारखंड के विकास और सामाजिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है और इसमें बड़ी कटौती से राज्य की वित्तीय स्थिति पर असर पड़ सकता है।
वहीं, केंद्र सरकार का पक्ष यह है कि बिल का उद्देश्य राज्यों की स्वायत्तता खत्म करना नहीं, बल्कि mining sector में tax और levy को अधिक समान और अनुमानित बनाना है। इसलिए अब बहस का असली केंद्र खनिज संसाधनों पर राज्यों की वित्तीय शक्ति बनाम एक समान राष्ट्रीय mining framework बन गया है।
FAQs
- हेमंत सोरेन ने PM मोदी से Mining Bill पर पुनर्विचार करने को क्यों कहा?
सोरेन का कहना है कि खनन से मिलने वाला राजस्व झारखंड की वित्तीय व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और नए प्रावधान राज्य की revenue-raising क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। - Jharkhand Mining Bill 2026 क्या है?
यह Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 है, जिसमें राज्यों की ओर से mineral rights और mineral-bearing land पर टैक्स, cess या अन्य levies लगाने की शक्ति को सीमित करने का प्रावधान है। - झारखंड को Mineral Bearing Land Cess से कितनी कमाई की उम्मीद थी?
हेमंत सोरेन के अनुसार, इससे करीब ₹7,110 करोड़ सालाना राजस्व मिलने की उम्मीद थी। - झारखंड की अर्थव्यवस्था में Mining Revenue कितना महत्वपूर्ण है?
सोरेन ने State Economic Survey 2025-26 के हवाले से कहा कि वित्त वर्ष 2024-25 में mining revenue राज्य के अपने non-tax revenue का 84.9 फीसदी था। - केंद्र सरकार Mining Bill को क्यों जरूरी बता रही है?
केंद्र का तर्क है कि अलग–अलग राज्यों में mining पर अलग और असमान वित्तीय बोझ sector में लागत और अनिश्चितता बढ़ाता है। बिल का उद्देश्य अधिक समान और एकरूप framework बनाना बताया गया है।

